Kids Story @ Mathiars
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1. होशिहार लड़की
बहोत सालो पहले की बात है, एक छोटे गाव में, किसी व्यापारी ने बदकिस्मती से एक साहूकार से बहोत ज्यादा पैसे ले रखे थे। साहूकार, जो पुराना और चिडचिडा था, वह अपने पैसो के बदले में व्यापारी से सौदा करना चाहता था। वो कहता था की यदि उसकी शादी व्यापारी की खुबसूरत बेटी से हुई तो वह उसके द्वारा लिए पैसो को भूल जायेंगा। व्यापारी के इस प्रस्ताव से व्यापारी और उसकी बेटी दोनों ही चिंतित थे।
तभी व्यापारी ने कहा की – उसने एक खाली बैग में एक सफ़ेद और एक कला कंकड़ रखा है। उस लड़की को बैग में से कोई भी एक कंकड़ निकालना था। यदि उसकी बेटी ने काला कंकड निकाला तो वह लड़की साहूकार की पत्नी बन जाएँगी और उसकी पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेंगा और यदि उस लड़की ने सफ़ेद कंकड़ निकाला तो उस लड़की की साहूकार से शादी नही होंगी और उसके पिता का कर्ज भी माफ़ कर दिया जायेंगा। लेकिन यदि उस लड़की ने कंकड़ निकालने से मना किया तो उसके पिता को जेल जाना होंगा।
उस समय पिता और बेटी व्यापारी कंकड़ भरे रास्ते पर खड़े थे। जैसा की साहूकार और उनके बिच सौदा हुआ था। साहूकार दो कंकड़ उठाने के लिए निचे झुका। जैसे ही साहूकार ने दो कंकड़ उठाये उस लड़की की तीखी नज़रो को दिख गया की साहूकार ने दोनों की काले कंकड़ उठाये और उन्हें ही बैग में डाला है। और ऐसा करने के बाद साहूकार ने उस लड़की को बैग में से कोई एक कंकड़ चुनने कहा।
यदि उस लड़की की जगह आप होते तो उस समय क्या करते? यदि आप उसे सलाह देना पसंद करोगे, तो आप उसे क्या सलाह दोंगे? ध्यान से परिस्थिती को देखने के बाद तीन ही संभावनाये हो सकती है
1. लड़की कंकड़ चुनने से इंकार कर दे।
2. लड़की ये बता दे की साहूकार ने बैग में दोनों ही काले कंकड़ डाले है, और साहूकार को धोखेबाज साबित करे।
3. लड़की उस बैग में से काले कंकड़ को चुने और अपने पिता को बचाने के लिए खुद को उस साहूकार से हवाले कर दे।ताकि उसके पिता का कर्ज भी माफ़ हो और उन्हें सजा भी ना मिले।
ये कहानी इस इरादे से कही गयी है की हम पश्च्विक पर तार्किक सोच के बिच के अंतर को जान सके।
उस लड़की ने बैग में हात डाला और कंकड़ बाहर निकाले। उसने जल्दी से एक कंकड़ निकाला और कंकड़ भरे रास्ते पर निकाले हुए कंकड़ को गिरा दिया। जल्द ही वह कंकड़ रास्ते पर दुसरे कंकडो में मिल गया।
उस लड़की ने तुरंत कहा, “ओह! मेरे हात से तो कंकड़ निचे गिर गया। लेकिन अभी भी कोई बात नही, हम अभी भी बैग में जो कंकड़ बचा हुआ है उस से पता कर सकते है की मैंने कोनसा कंकड़ चुना था।”
अब जब देखा गया तो बैग में सिर्फ काला कंकड़ ही बचा हुआ था, और ऐसा माना गया की उस लड़की ने सफ़ेद कंकड़ चुना था। और तभी से साहूकार की भी धोखेबाजी करने की हिम्मत नही हुई। और लड़की ने अपने दिमाग से खुद को भी बचा लिया और अपने पिता को भी बचा लिया। और असंभव को भी संभव कर दिया।
2. ईमानदारी
राजेश अपने स्कूल में होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोह को ले कर बहुत उत्साहित था। वह भी परेड़ में हिस्सा ले रहा था।
दूसरे दिन वह एकदम सुबह जग गया लेकिन घर में अजीब सी शांति थी। वह दादी के कमरे में गया, लेकिन वह दिखाई नहीं पड़ी।
"माँ, दादीजी कहाँ हैं?" उसने पूछा।
"रात को वह बहुत बीमार हो गई थीं। तुम्हारे पिताजी उन्हें अस्पताल ले गए थे, वह अभी वहीं हैं उनकी हालत काफी खराब है।
राजेश एकाएक उदास हो गया।
उसकी माँ ने पूछा, "क्या तुम मेरे साथ दादी जी को देखने चलोगे? चार बजे मैं अस्पताल जा रही हूँ।"
राजेश अपनी दादी को बहुत प्यार करता था। उसने तुरंत कहा, "हाँ, मैं आप के साथ चलूँगा।" वह स्कूल और स्वतंत्रता दिवस के समारोह के बारे में सब कुछ भूल गया।
स्कूल में स्वतंत्रता दिवस समारोह बहुत अच्छी तरह संपन्न हो गया। लेकिन प्राचार्य खुश नहीं थे। उन्होंने ध्यान दिया कि बहुत से छात्र आज अनुपस्थित हैं।
उन्होंने दूसरे दिन सभी अध्यापकों को बुलाया और कहा, "मुझे उन विद्यार्थियों के नामों की सूची चाहिए जो समारोह के दिन अनुपस्थित थे।"
आधे घंटे के अंदर सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों की सूची उन की मेज पर थी। कक्षा छे की सूची बहुत लंबी थी। अत: वह पहले उसी तरफ मुड़े।
जैसे ही उन्होंने कक्षा छे में कदम रखे, वहाँ चुप्पी सी छा गई। उन्होंने कठोरतापूर्वक कहा, "मैंने परसों क्या कहा था?"
"यही कि हम सब को स्वतंत्रता दिवस समारोह में उपस्थित होना चाहिए," गोलमटोल उषा ने जवाब दिया।
"तब बहुत सारे बच्चे अनुपस्थित क्यों थे?" उन्होंने नामों की सूची हवा में हिलाते हुए पूछा।
फिर उन्होंने अनुपस्थित हुए विद्यार्थियों के नाम पुकारे, उन्हें डाँटा और अपने डंडे से उनकी हथेलियों पर मार लगाई।
"अगर तुम लोग राष्ट्रीय समारोह के प्रति इतने लापरवाह हो तो इसका मतलब यही है कि तुम लोगों को अपनी मातृभूमि से प्यार नहीं है। अगली बार अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम सबके नाम स्कूल के रजिस्टर से काट दूँगा।"
इतना कह कर वह जाने के लिए मुड़े तभी राजेश आ कर उन के सामने खड़ा हो गया।
"क्या बात है?"
"महोदय, राजेश भयभीत पर दृढ़ था, मैं भी स्वतंत्रता दिवस समारोह में अनुपस्थित था, पर आप ने मेरा नाम नहीं पुकारा।" कहते हुए राजेश ने अपनी हथेलियाँ प्राचार्य महोदय के सामने फैला दी।
सारी कक्षा साँस रोक कर उसे देख रही थी।
प्राचार्य कई क्षणों तक उसे देखते रहे। उनका कठोर चेहरा नर्म हो गया और उन के स्वर में क्रोध गायब हो गया।
"तुम सजा के हकदार नहीं हो, क्योंकि तुम में सच्चाई कहने की हिम्मत है। मैं तुम से कारण नहीं पूछूँगा, लेकिन तुम्हें वचन देना होगा कि अगली बार राष्ट्रीय समारोह को नहीं भूलोगे। अब तुम अपनी सीट पर जाओ।
3. झील का राक्षस
एक जंगल में सभी जानवर मिलजुल कर रहते थे. उस जंगल में एक बहुत ही विशाल व सुंदर झील थी. जंगल के सभी जानवर उसी झील के पानी से अपनी प्यास बुझाते थे. सब कुछ हंसी-ख़ुशी चल रहा था कि इसी बीच न जाने कहां से एक भयानक राक्षस उस झील में रहने के लिए आ गया. उस राक्षस ने उस झील पर कब्ज़ा कर लिया और झील को ही अपना घर बना लिया. राक्षस ने जंगल के सभी जानवरों को उस झील में घुसने से व वहां का पानी इस्तेमाल करने से मना कर दिया.
इसी जंगल में बंदरों की एक विशाल टोली भी रहती थी. इस परेशानी से निपटने के लिए बंदरों ने सभा बुलाई. बंदरों के सरदार ने सभी बंदरों से कहा, “साथियो! हमारी झील पर एक राक्षस ने कब्ज़ा कर लिया और अगर हम में से कोई भी वहां गया, तो वो हमें खा जाएगा.”
बंदरों ने अपने सरदार से कहा, “लेकिन सरदार, पानी के बिना हमारा गुज़ारा कैसे होगा? हम तो प्यासे ही मर जाएंगे…”
सरदार ने कहा, “मुझे सब पता है, लेकिन अगर हमें सुख-शांति से रहना है, तो झील को छोड़ना ही होगा. बेहतर होगा कि हम सब नदी के पानी से ही गुज़ारा करें और झील के पानी का भूल ही जाएं.” सभी बंदर मान गए.
कई साल गुज़र गए और इस बीच जंगल के किसी भी जानवर ने उस झील की ओर रुख तक नहीं किया. तभी बहुत बड़ा अकाल पड़ा. नदी सूख चुकी थी. खाने और पानी की किल्लत के चलते जंगल के सभी जानवर उस जंगल को छोड़कर जाने लगे, लेकिन बंदरों को टोली को इस जंगल से बेहद लगाव था. उन्होंने इस समस्या से निपटने के लिए बैठक बुलाई. सभी बंदरों ने कहा, “अगर जल्द ही पानी की व्यवस्था नहीं हुई, तो हम सब मर जाएंगे. क्यों न हम झील का पानी इस्तेमाल करें, वहां का पानी कभी नहीं सूखता, लेकिन क्या वो राक्षस मानेगा?”
बंदरों के सरदार ने कहा, “एक तरीक़ा है, हम सबको उस राक्षस से विनती करनी चाहिए, शायद उसको हम पर तरस आ जाए और वो मान जाए.”
सभी बंदर झील के पास गए. बंदरों के सरदार ने झील के राक्षस को आवाज़ दी, “झील के मालिक, कृपया बाहर आकर हमारी विनती सुनें.”
थोड़ी देर में ही झील में से राक्षस बाहर निकला. उसकी आंखें गुस्से से लाल थीं. वो ज़ोर से चिंघाड़ते हुए बोला, “तुम लोग कौन हो और यहां क्यों आए हो? मैं आराम कर रहा था, मेरी नींद क्यों ख़राब की, इसका अंजाम जानते नहीं हो क्या?”
राक्षस की बात सुनकर बंदरों का सरदार विनती करते हुए दयनीय आवाज़ में बोलता है, “सरदार, महाराज, आप शक्तिशाली और महान हैं. इस जंगल में बहुत बड़ा अकाल पड़ा है. भूख-प्यास से सभी जानवर बेहाल है. अगर पानी नहीं मिला, तो हम सब मर जाएंगे. हम आपसे इस झील का पानी पीने की इजाज़त चाहते हैं.”
राक्षस और गुस्से में बोलता है, “मैं तुम में से किसी को भी इस झील में घुसने नहीं दुंगा, अगर किसी ने हिम्मत की, तो मैं उसे खा जाऊंगा.” यह बोलकर राक्षस वापस झील में चला जाता है.
सभी बंदर बेहद निराश-हताश हो जाते हैं. लेकिन बंदरों का सरदार कुछ सोचता रहता है. उसे एक तरकीब सूझती है. वो सभी बंदरों को बोलता है, “तुम में से कुछ बंदर झील के पास ही एक गहरा गड्ढा खोदो और बाकी के बंदर मेरे साथ बांस के खेत में चलो.”
बंदरों का सरदार बंदरों को लेकर बांस के खेत में चला गया. वहां जाकर उसने बंदरों को खेत के कुछ लंबे व मज़बूत बांसों को काटने का आदेश दिया. बंदरों ने अपना काम कर दिया. वहीं दूसरी ओर झील के पास भी गड्ढा खोदा जा चुका था. बंदरों के सरदार ने बांस लिया और बांस का एक सिरा झील में डुबाया और दूसरा सिरे को गड्ढे की तरफ़ मोड़कर उसमें से ज़ोर-ज़ोर से तब तक सांस खींचता रहा, जब तक कि उसमें से पानी न आ गया हो. देखते ही देखते झील में से पानी उस गड्ढे में जमा होता गया. यह देखकर झील का राक्षस गुस्से में बाहर आया, लेकिन चूंकि सारे बंदर झील के बाहर थे, तो वो उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका. राक्षस गुस्से में ही वापस झील में चला गया. बंदरों ने ख़ुशी-ख़ुशी झील का मीठा पानी खूब मज़े से पिया.
सीख: बुद्धि बल से बड़ी होती है. चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, बुद्धि व समझदारी के सामने उसका बल मायने नहीं रखता, इसलिए बड़ी से बड़ी मुसीबत के समय भी अपना संयम नहीं खोना चाहिए और बुद्धि से काम लेना चाहिए
4. मोम का शेर
सर्दियों के दिन थे, अकबर का दरबार लगा हुआ था। तभी फारस के राजा का भेजा एक दूत दरबार में उपस्थित हुआ।
राजा को नीचा दिखाने के लिए फारस के राजा ने मोम से बना शेर का एक पुतला बनवाया था और उसे पिंजरे में बंद कर के दूत के हाथों अकबर को भिजवाया, और उन्हे चुनौती दी की इस शेर को पिंजरा खोले बिना बाहर निकाल कर दिखाएं।
बीरबल की अनुपस्थिति के कारण अकबर सोच पड़ गए की अब इस समस्या को कैसे सुलझाया जाए। अकबर ने सोचा कि अगर दी हुई चुनौती पार नहीं की गयी तो जग हसायी होगी। इतने में ही परम चतुर, ज्ञान गुणवान बीरबल आ गए। और उन्होने मामला हाथ में ले लिया।
बीरबल ने एक गरम सरिया मंगवाया और पिंजरे में कैद मोम के शेर को पिंजरे में ही पिघला डाला। देखते-देखते मोम पिघल कर बाहर निकल गया ।
अकबर अपने सलाहकार बीरबल की इस चतुराई से काफी प्रसन्न हुए और फारस के राजा ने फिर कभी अकबर को चुनौती नहीं दी।
5. मकड़ी, चीँटी और जाला
एक मकड़ी थी. उसने आराम से रहने के लिए एक शानदार जाला बनाने का विचार किया और सोचा की इस जाले मे खूब कीड़ें, मक्खियाँ फसेंगी और मै उसे आहार बनाउंगी और मजे से रहूंगी . उसने कमरे के एक कोने को पसंद किया और वहाँ जाला बुनना शुरू किया. कुछ देर बाद आधा जाला बुन कर तैयार हो गया. यह देखकर वह मकड़ी काफी खुश हुई कि तभी अचानक उसकी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो उसे देखकर हँस रही थी.
मकड़ी को गुस्सा आ गया और वह बिल्ली से बोली , ” हँस क्यो रही हो?”
“हँसू नही तो क्या करू.” , बिल्ली ने जवाब दिया , ” यहाँ मक्खियाँ नही है ये जगह तो बिलकुल साफ सुथरी है, यहाँ कौन आयेगा तेरे जाले मे.”
ये बात मकड़ी के गले उतर गई. उसने अच्छी सलाह के लिये बिल्ली को धन्यवाद दिया और जाला अधूरा छोड़कर दूसरी जगह तलाश करने लगी. उसने ईधर ऊधर देखा. उसे एक खिड़की नजर आयी और फिर उसमे जाला बुनना शुरू किया कुछ देर तक वह जाला बुनती रही , तभी एक चिड़िया आयी और मकड़ी का मजाक उड़ाते हुए बोली , ” अरे मकड़ी , तू भी कितनी बेवकूफ है.”
“क्यो ?”, मकड़ी ने पूछा.
चिड़िया उसे समझाने लगी , ” अरे यहां तो खिड़की से तेज हवा आती है. यहा तो तू अपने जाले के साथ ही उड़ जायेगी.”
मकड़ी को चिड़िया की बात ठीक लगीँ और वह वहाँ भी जाला अधूरा बना छोड़कर सोचने लगी अब कहाँ जाला बनायाँ जाये. समय काफी बीत चूका था और अब उसे भूख भी लगने लगी थी .अब उसे एक आलमारी का खुला दरवाजा दिखा और उसने उसी मे अपना जाला बुनना शुरू किया. कुछ जाला बुना ही था तभी उसे एक काक्रोच नजर आया जो जाले को अचरज भरे नजरो से देख रहा था.
मकड़ी ने पूछा – ‘इस तरह क्यो देख रहे हो?’
काक्रोच बोला-,” अरे यहाँ कहाँ जाला बुनने चली आयी ये तो बेकार की आलमारी है. अभी ये यहाँ पड़ी है कुछ दिनों बाद इसे बेच दिया जायेगा और तुम्हारी सारी मेहनत बेकार चली जायेगी. यह सुन कर मकड़ी ने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा .
बार-बार प्रयास करने से वह काफी थक चुकी थी और उसके अंदर जाला बुनने की ताकत ही नही बची थी. भूख की वजह से वह परेशान थी. उसे पछतावा हो रहा था कि अगर पहले ही जाला बुन लेती तो अच्छा रहता. पर अब वह कुछ नहीं कर सकती थी उसी हालत मे पड़ी रही.
जब मकड़ी को लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता है तो उसने पास से गुजर रही चींटी से मदद करने का आग्रह किया .
चींटी बोली, ” मैं बहुत देर से तुम्हे देख रही थी , तुम बार- बार अपना काम शुरू करती और दूसरों के कहने पर उसे अधूरा छोड़ देती . और जो लोग ऐसा करते हैं , उनकी यही हालत होती है.” और ऐसा कहते हुए वह अपने रास्ते चली गई और मकड़ी पछताती हुई निढाल पड़ी रही.
दोस्तों , हमारी ज़िन्दगी मे भी कई बार कुछ ऐसा ही होता है. हम कोई काम start करते है. शुरू -शुरू मे तो हम उस काम के लिये बड़े उत्साहित रहते है पर लोगो की वजह से उत्साह कम होने लगता है और हम अपना काम बीच मे ही छोड़ देते है और जब बाद मे पता चलता है कि हम अपने सफलता के कितने नजदीक थे तो बाद मे पछतावे के अलावा कुछ नही बचता.
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